Chaturasi ji Part 1
श्रीहित चौरासी ॥Shree Hit Chaturasi॥ श्रीहित चौरासी निगम अगोचर बात कहा कहीं अतिहि अनौखी । उभय मीत की प्रीति रीति चोखी ते चोखी वृन्दावन छबि देखि देखि, हुलसत हुलसावत । जल-तरंगवत् गौर श्याम विलसत विलसावत ॥ ललितादिक निज सहचरी, निरखि निरखि बलि जात नित । चौरासी हित पद कहे, चतुरन की यह परम वित् ॥ […]
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