Chaturasi ji Part 1

श्रीहित चौरासी

॥Shree Hit Chaturasi॥

श्रीहित चौरासी निगम अगोचर बात कहा कहीं अतिहि अनौखी । उभय मीत की प्रीति रीति चोखी ते चोखी वृन्दावन छबि देखि देखि, हुलसत हुलसावत । जल-तरंगवत् गौर श्याम विलसत विलसावत ॥ ललितादिक निज सहचरी, निरखि निरखि बलि जात नित । चौरासी हित पद कहे, चतुरन की यह परम वित् ॥ | जोई जोई प्यारी करै सोई मोहि भावै,| भावै मोहि जोई सोई सोई करें प्यारे मोकों तौ भावती ठौर प्यारे के नैनन में, प्यारी भयौ चाहै मेरे नैनन के तारे ॥ मेरे तन मन प्राण हूँ ते प्रीतम प्रिय, अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसों हारे ।जै श्रीहित हरिवंश हंस हंसिनी साँवल – गौर, कही कौन करै जल तरंगनि न्यारे ||1|| प्यारे बोली भामिनी आजु नीकी जामिनी, भेंट नवीन मेघ सौं दामिनी ॥ मान करे,ऐसी कौन कामिनी ।मोहन रसिक-राइरी माई,तासौं जु – जै श्रीहित हरिवंश श्रवण सुनत प्यारी, राधिकारमण सौं मिली गज-गामिनी ॥2॥ | प्रात समय दोऊ रस लंपट | सुरत- जुद्ध जय जुत अति फूल ।श्रम वारिज घनविन्दु वदन पर, भूषण अंगहि अंग विकूल ॥कछु रह्यौ तिलक सिथिल अलकावलि, वदन कमल मानौं अलि भूल ।जै श्रीहित हरिवंश मदन रंग रॅगि रहे, नैन-बैंन कटि सिथिल दुकूल ॥3॥ | आजु तौ जुवति तेरी, वदन आनन्द भय,| पिय के संगम के सूचत सुख चैन ।आलस वलित बोल, सुरंग रंगे कपोल, विथकित अरुण उनींदे दोऊ नैंन ॥ रुचिर तिलक लेश किरत कुसुम केश, सिर सीमंत भूषित मानौं तैं न ।4| करुणाकर उदार राखत कछु न सार, दसन-वसन लागत जब देंन ॥ काहे कौं दुरत भीरु, पलटे प्रीतम चीर, बस किये श्याम सिखै सत मैंन ।गलित उरसि माल सिथिल किंकिनी जाल, जै श्रीहित हरिवंश लता गृह सैन |।4|| |आजु प्रभात लता-मंदिर में,| सुख बरसत अति हरषि युगल वर ।गौर-श्याम अभिराम रंगभरे, लटकि-लटकि पग धरत अवनि पर ॥कुच-कुमकुम रंजित मालावलि, सुरत नाथ श्रीश्याम धाम धर । प्रिया प्रेम के अंक अलंकृत, चित्रित चतुर शिरोमनि निजकर दम्पति अति अनुराग मुदित कल, गान करत मन हरत परस्पर । जै श्रीहित हरिवंश प्रशंस परायन, गायन अलि सुर देत मधुर तर ॥5॥ | कौन चतुर जुवती प्रिया, | जाहि मिलत लाल चोर है रैन ।दुरवत क्योंऽव दुरै सुनि प्यारे, रंग में गहिले चैन में नैन ॥ उर नख चंद्र विराने, पट अटपटे से बैन । जैश्रीहित हरिवंश रसिक राधापति, प्रमथित मैन।।6 ।। | आजु निकुंज मंजु में खेलत, नवल किशोर नवीन किशोरी । अति अनुपम अनुराग परस्पर, सुनि अभूत भूतल पर जोरी ॥ विद्रुम फटिक विविध निर्मित धर, नव कर्पूर पराग न थोरी । कोमल किसलय सयन सुपेसल, तापर श्याम निवेसित गोरी मिथुन हास-परिहास परायन, पीक कपोल कमल पर झोरी ।।7।। ौर-श्याम भुज कलह मनोहर, नीवी-बंधन मोचत डोरीहरि उर-मुकुर विलोकि अपनपौ, विभ्रम विकल मान-जुत भोरीचिबुक सुचारु प्रलोइ प्रबोधत, पिय प्रतिबिंब जनाय निहोरीनेति नेति बचनामृत सुनि-सुनि, ललितादिक देखत दुरि चोरीजै श्रीहित हरिवंश करत कर धूनन, प्रणयकोप मालावलि तोरी ||7|| | अति ही अरुण तेरे नैन नलिन री | आलस जुत इतरात रंगमगे, भये निशि जागर मषिन मलिन री ॥ सिथिल पलक में उठत गोलक गति, बिंधयौ मोहन मृग सकत चलि न री ।जै श्रीहित हरिवंश हंस कल गामिनि, संभ्रम देत भ्रमरन अलिन री ॥8॥ | बनी श्रीराधा-मोहन की जोरी। इन्द्रनीलमणि श्याम मनोहर, सातकुम्भ तन गोरी ॥भाल विशाल तिलक हरि कामिनि, चिकुर चंद्र बिच रोरी ।गज नायक प्रभु चाल गयंदनि, गति वृषभानु किसोरी ॥ नील निचोल जुवति मोहन पट, पीत अरुण सिर खोरी। जै श्रीहित हरिवंश रसिक राधापति, सुरत रंग में बोरी ॥9॥ | आजु नागरी-किशोर भाँवती विचिन जोर, | कहा कहीँ अंग-अंग परम माधुरी । करत केलि कंठ मेलि बाहुदंड गंड-गेड, परस सरस रास-लास मंडली जुरी ॥ श्यामसुन्दरी बिहार, बाँसुरी मृदंग तार, मधुर घोष नूपुरादि किंकिनी चुरी । जै श्री देखत हरिवंश आलि, निर्तनी सुधंग चाल, वारि फेर देत प्राण देह सौं दुरी ॥10॥ | मंजुल कल कुंज देश, राधा हरि विशद वेश, | राका नभ कुमुद-बंधु शरद जामिनी ।साँवल दुति कनक अंग, बिहरत मिलि एक संग, नीरद मनौ नील मध्य लसत दामिनी ॥ अरुण पीत नव दुकूल, अनुपम अनुराग मूल, सौरभयुत शीत अनिल मंद गामिनी ।।11।। । किसलय दल रचित शैन, बोलत पिय चाटु बैन,| मान सहित प्रतिपद प्रतिकूल कामिनी ॥मोहन मन मथत मार, परसत कुच-नीवि-हार, वेपथयुत नेति-नेति बढ़त भामिनी ।नरवाहन प्रभु सुकेलि, बहुविध भर भरत झेलि, सौरत रस रूप नदी जगत पावनी ॥11।। | चलहि राधिके सुजान, तेरे हित सुख निधान,| रास रच्यौ श्याम तट कलिंद नन्दिनी ।निर्त्तत युवती समूह, राग-रंग अति कुतूह, बाजत रसमूल मुरलिका अनन्दिनी ॥वंशीवट निकट जहाँ, परम रमनि भूमि तहाँ, सकल सुखद मलय बहै वायु मन्दिनी ॥12॥ ॥ जाती ईषद विकास, कानन अतिसय सुवास ॥ राका निशि सरद मास विमल चंदिनी ॥ नरवाहन प्रभु निहारि, लोचन भरि घोष-नारि, नख सिख सौन्दर्य काम-दुख-निकन्दिनी । विलस भुज ग्रीव मेलि, भामिनी सुख-सिन्धु झेलि, नव निकुंज श्याम केलि,जगत वन्दिनी ॥12॥ नन्द के लाल ह मन मोर । हौं अपने मोतिन लर पोवत, काँकर डारि गयौ सखि भोर ॥ बंक विलोकनि चाल छबीली, रसिक शिरोमनि नन्द किशोर ।कहि कैसे मन रहत श्रवन सुनि, सरस मधुर मुरली की घोर ॥ इंदु गोविन्द वदन के कारन, चितवन कौं भये नैंन चकोर । (जैनी)हित हरिवंश रसिक रस जुवती,तू लै मिल सखी प्रान अकोर ॥13॥ अधर अरुण तेरे कैसे के दुराऊँ । रवि ससि शंक भजन कियौ अपवस, अद्भुत रंगन कुसुम बनाउँसुभ कौसेय कसिव कौस्तुभमनि, पंकज सुतन लै अंगनु लुपाऊँहरषित इन्दु तजत जैसे जलधर, सो भ्रम ढूँढ़ि कहाँ हौं पाऊँअम्बुन दम्भ कछू नहीं व्यापत, हिमकर तपै ताहि कैसे कै बुझाउँ(3) हित हरिवंश रसिक नवरंग पिय, भृकुटी भौंह तेरे खंजन लराऊँ॥14॥ ॥ अपनी बात मोसौं कहि री भामिनी, ॥ औंगी मौंगी रहत गरव की माती।हौंतोसौं कहत हारी, सुनिरी राधिका प्यारी, निशि की रंग क्यौं न कहत लजाती ॥ गलित कुसुम बैनी, सुनिरी सारंग नैनी, छूटी लट अचरा बढ़त अलसाती ॥15॥ अधर निरंग रंग रच्यौरी कपोलन, 15 जुवति चलत गजगति अरुझाती ॥रहसि रमी छबीले, रसन वसन ढीले, शिथिल कसनि कंचुकी उर राती।सखी सौं सुनि श्रवन, वचन मुदित मन, चली हरिवंश भवन मुसिकाती ||15|| | आजु मेरे कहे चली मृग नी । गावत सरस जुवति मंडल में, पिय सौं मिलें भौं पिक नी परम प्रवीन कोक-विद्या में, अभिनय निपुन लाग गति लैनीरूपरासि सुनि नवल किशोरी, पल-पल घटत चाँदनी रैनीजयी हित हरिवंश चली अति आतुर, राधारवन सुरत सुख दैनीरहसि रभस आलिंगन चुम्बन, मदन कोटि कुल भई कुचैनी ||16|| आजु देखि ब्रजसुन्दरी मोहन बनी कैलि । अंस-अंस बाहु दै, किशोर जोर रूप रासि, मनौ तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि नव निकुंज भ्रमर गुञ्ज, मंजु घोष प्रेम पुञ्ज, गान करत मोर पिकन अपने सुर सों मेलि । मदन मुदित अंग-अंग, बीच-बीच सुरत रंग, पल-पल हरिवंश पिवत नैन चषक झेलि ॥17|| सुनि मेरी वचन छबीली राधा। तें पायौ रससिंधु अगाधा ॥तू वृषभानु गोप की बेटी । मोहनलाल रसिक हँसि भेटी ॥जाहि बिरंचि उमापति नाये । तापै तैं वन फूल बिनाये ॥जो रस नेति-नेति श्रुति भाख्यौ । ताकी तैं अधर सुधारस चाख्यौ ॥तेरी रूप कहत नहि आवै । हित हरिवंश कछुक जस गावै ॥18॥ खेलत रास रसिक ब्रज मण्डन । जुवतिन अंस दिये भुज दण्डन ॥ सरद विमल नभ चन्द्र विराजै । मधुर-मधुर मुरली कल बाजे ॥ अति राजत घनश्याम तमाला। कंचन बेलि बनी ब्रजबाला ॥ बाजत ताल मृदंग उपंगा। गान मथत मन कोटि अनंगा ॥ भूषन बहुत विविध रंग सारी । अंग सुधंग दिखावत नारी ॥ बरसत कुसुम मुदित सुरयोषा । सुनियत दिवि ढुंदुभि कल घोषा ॥ (ओ)हित हरिवंश मगन मन श्यामा ।राधारवन सकल सुख धामा ॥19|| |मोहन लाल के रस माती । बधू गुपत-गोवत कत मोसौं, प्रथम नेह सकुचाती ॥ देख संभार पीत पट ऊपर, कहाँ चूनरी राती।टूटी लर लटकत मोतिन की, नख बिधु अंकित छाती ॥अधर-बिंब खंडित मषि मंडित, गंड चलत अरुझाती । अरुन नैन घूमत आलस जुत, कुसुम गलित लटपाती ॥आजु रहसि मोहन सब लूटी, विविध आपनी थाती।अहितहरिवंश वचन सुनिभामिनि,भवन चली मुसिकाती।।20।। तेरे नैन करत दोऊ चारी । अति कुलकात समात नहीं कहुँ, मिले हैं कुञ्जबिहारी ॥ बिथुरी माँग कुसुम गिरि गिरि परे, लटकि रही लट न्यारी। उर नख-रेख प्रगट देखियत है, कहा दुरावत प्यारी ॥ परी है पीक सुभग गंडन पर, अधर निरंग सुकुमारी। (जैश्री)हित हरिवंश रसिकनी भामिनि, आलस अँग अँग भारी ॥21॥ | नैनन पर वारों कोटिक खंजन । चंचल चपल अरुन अनियारे, अग्रभाग बन्यौ अंजन ॥ रुचिर मनोहर वक्र बिलोकन, सुरत- समर-दल-गंजन । (जैश्री) हित हरिवंश कहत न बनें छबि, सुखसमुद्र मनरंजन ॥22॥ राधा प्यारी तेरे नैन सलोल । तैं निज भजन कनक तन जोवन, लियौ मनोहर मोल ॥ अधर निरंग अलक लट छूटी, रंजित पीक कपोल । तू रस मगन भई नहि जानत, ऊपर पीत निचोल ॥ कुच युग पर नख-रेख प्रगट मानौं, शंकर सिर ससि-टोल । (जैश्री हित हरिवंश कहत कछु भामिनि, अति आलस सौं बोल ॥23॥ आजु गोपाल रास रस खेलत, पुलिन कल्पतरु तीर री सजनी ।सरद विमल नभ चन्द्र विराजत, रोचक निविध समीर री सजनी ॥ चंपक बकुल मालती मुकुलित, मत्त मुदित पिक कीर री सजनी ॥24॥ देसी सुधंग राग रंग नीकी, ब्रज जुवतिन की भीर री सजनी ॥मघवा मुदित निसान बजायौ, व्रत छाँड्यौ मुनि धीर री सजनी ।(जैश्री)हित हरिवंश मगन मन श्यामा, हरत मदन घन पीर री सजनी ॥24॥ ॐ जय गौरी नंदा ॥

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