
Shree Hit Harivansh Mahprabhu | श्री हित हरिवंश महाप्रभु
राधावल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक और श्री कृष्ण की मुरली के अवतारShree Hit Harivansh Mahprabhu – ब्रज की पावन धरा पर भक्ति की अविरल धारा बहाने वाले श्री हित हरिवंश महाप्रभु का प्राकट्य संवत 1530 (वैशाख शुक्ल एकादशी) को मथुरा के निकट ‘बाद’ ग्राम में हुआ था। इन्हें साक्षात भगवान श्री कृष्ण की ‘वंशिका’ (मुरली) का अवतार माना जाता है।
Shree Hit Harivansh Mahprabhu – बाल्यकाल और दिव्य घटनाएँ
महाप्रभु के पिता का नाम श्री व्यास मिश्र और माता का नाम तारा रानी था। बचपन से ही उनके जीवन में अलौकिक घटनाएं घटने लगी थीं। मात्र 7 वर्ष की आयु में उन्होंने देववन के एक गहरे कुएं से ‘श्री श्याम वर्ण द्विज मुरली धरी’ विग्रह प्राप्त किया था। उनकी भक्ति में इतना आकर्षण था कि जो भी उनके संपर्क में आता, वह राधा-नाम के रंग में रंग जाता।
वृंदावन गमन और राधावल्लभ संप्रदाय
32 वर्ष की आयु में श्री राधा रानी की प्रेरणा से वे वृंदावन की ओर प्रस्थान कर गए। मार्ग में चिरथावल ग्राम में श्री राधा रानी के स्वप्न आदेशानुसार उन्होंने एक ब्राह्मण की दो कन्याओं से विवाह किया और फिर वृंदावन के घने जंगलों को अपनी भक्ति से महका दिया। उन्होंने ही राधावल्लभ संप्रदाय की नींव रखी, जहाँ श्री राधा और कृष्ण को एक ही प्राण, दो देह माना जाता है।
साहित्यिक रचनाएँ
महाप्रभु ने ब्रज भाषा में भक्ति साहित्य को एक नई ऊंचाई दी। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:
- हित चौरासी: 84 पदों का यह संग्रह ब्रज भक्ति काव्य का आधार स्तंभ है।
- श्री राधा सुधा निधि: संस्कृत में रचित यह ग्रंथ राधा रानी की महिमा का गुणगान करता है।
- स्फुट वाणी: भक्ति और प्रेम के विविध पदों का संकलन।
विशेष संदेश
महाप्रभु का मार्ग “हित” (प्रेम) का मार्ग था। उन्होंने सिखाया कि भगवान तक पहुँचने के लिए केवल प्रेम और सेवा ही पर्याप्त है। उनके अनुसार श्री राधा रानी ही सर्वोच्च शक्ति और प्रेम की अधिष्ठात्री देवी हैं।


