Shree Vallabha Acharya Maharaj

Vallabha Acharya Maharaj

Vallabha Acharya Ji महाप्रभु वल्लभाचार्य: पुष्टिमार्ग के प्रणेता और शुद्धाद्वैत के स्तंभ

Vallabha Acharya : भारतीय भक्ति आंदोलन के इतिहास में जगद्गुरु श्री वल्लभाचार्य महाप्रभु का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे न केवल एक महान दार्शनिक थे, बल्कि भगवान श्री कृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति के मार्ग ‘पुष्टिमार्ग’ के संस्थापक भी थे। उनका जीवन दिव्य चमत्कारों, अटूट ज्ञान और भक्ति की रसधार से भरा हुआ है।

Vallabha Acharya ji जन्म और प्रारंभिक जीवन

श्री वल्लभाचार्य (1479–1531 ईस्वी) का जन्म एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट और माता का नाम इलम्मागारू था। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, उनका जन्म छत्तीसगढ़ के चंपारण्य के जंगलों में हुआ था, जब उनका परिवार वाराणसी से दक्षिण की ओर जा रहा था। कहा जाता है कि वे साक्षात अग्नि के अवतार थे।

शिक्षा और ज्ञान की विजय

बचपन से ही उनकी बुद्धि अत्यंत कुशाग्र थी। उन्होंने अल्पायु में ही वेदों, उपनिषदों और पुराणों का गहन अध्ययन कर लिया था। उनकी विद्वत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेवराय के दरबार में मिलता है, जहाँ उन्होंने शास्त्रार्थ में मायावाद के समर्थकों को पराजित किया और ‘कनकाभिषेक’ से सम्मानित हुए। इसी दौरान उन्हें ‘जगद्गुरु’ और ‘महाप्रभु’ की उपाधि प्राप्त हुई।

पुष्टिमार्ग और शुद्धाद्वैत दर्शन

वल्लभाचार्य जी ने ‘शुद्धाद्वैत’ दर्शन का प्रतिपादन किया, जो यह मानता है कि ब्रह्म और जगत अलग नहीं हैं; यह संसार भगवान श्री कृष्ण की लीला का ही विस्तार है। उन्होंने ‘पुष्टिमार्ग’ की स्थापना की, जिसका अर्थ है ‘ईश्वर के पोषण (अनुग्रह) का मार्ग’। उनके अनुसार, भगवान की कृपा ही जीव के उद्धार का एकमात्र साधन है।

श्रीनाथजी का प्राकट्य और गोवर्धन सेवा

महाप्रभु का ब्रज भूमि से अटूट संबंध था। उन्होंने गोवर्धन पर्वत पर श्रीनाथजी के विग्रह की स्थापना की और उनकी सेवा पद्धति का विस्तृत विधान बनाया। उन्होंने समाज को सिखाया कि ईश्वर की उपासना केवल सन्यास से नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए ‘सेवा’ के माध्यम से भी की जा सकती है।

साहित्यिक योगदान

महाप्रभु ने कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की, जिनमें ‘अनुभाष्य’ (ब्रह्मसूत्र पर टीका), ‘सुबोधिनी’ (श्रीमद्भागवत पर टीका) और ‘षोडश ग्रंथ’ अत्यंत प्रसिद्ध हैं। उनकी मधुरवाणी आज भी ‘मधुराष्टकम’ के रूप में भक्तों के हृदय में गूँजती है— “अधरं मधुरं वदनं मधुरं…”

अंतिम समय और संदेश

अपने जीवन के अंतिम समय में, उन्होंने वाराणसी के हनुमान घाट पर गंगा नदी में जल-समाधि ली। उनका संपूर्ण जीवन हमें सिखाता है कि श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य है।

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