
Bhagwat Geeta – कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग और राज योग का दिव्य परिचय
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के चार प्रमुख योग पथों का उपदेश दिया, जो मोक्ष प्राप्ति के सरल मार्ग हैं। ये योग कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर गीता के विभिन्न अध्यायों में वर्णित हैं [web:1][web:34].
ये चार योग सभी के लिए सुलभ हैं और इन्हें अपनाकर मनुष्य परम शांति प्राप्त कर सकता है।
Bhagwat Geeta
🔥 कर्म योग (कार्य का योग)
परिभाषा: निष्काम कर्म करना, फल की इच्छा त्यागकर कर्तव्य पालन करना।
यह तीसरे अध्याय ‘कर्मयोग’ में विस्तार से बताया गया है, जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म न करने से शरीर की यात्रा भी संभव नहीं [web:6][web:30].
- निष्काम भाव से कार्य करें।
- फल का मोह न रखें।
- समाज सेवा में लीन रहें।
❤️ भक्ति योग (भक्ति का योग)
परिभाषा: ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेमपूर्ण भक्ति।
बारहवें अध्याय ‘भक्तियोग’ में श्रीकृष्ण भक्तों के गुण बताते हैं और कहते हैं कि ऐसे भक्त उन्हें सबसे प्रिय हैं [web:15][web:20].
- निरंतर भजन-कीर्तन।
- सभी में ईश्वर का दर्शन।
- पूर्ण समर्पण।
🧠 ज्ञान योग (ज्ञान का योग)
परिभाषा: आत्मा और परमात्मा के ज्ञान द्वारा विवेक प्राप्ति।
चौथे अध्याय ‘ज्ञानकर्मसंन्यास योग’ में इसका वर्णन है, जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह योग प्राचीन काल से चला आ रहा है [web:33][web:39].
- आत्म-चिंतन।
- माया से परे ज्ञान।
- शास्त्र अध्ययन।
🧘 राज योग (ध्यान का योग)
परिभाषा: मन और इंद्रियों का संयम, ध्यान द्वारा समाधि।
छठे अध्याय ‘ध्यान योग’ या ‘आत्मसंयम योग’ में विस्तृत है, जो राज योग के अष्टांग मार्ग पर आधारित है [web:1][web:51].
- ध्यान और प्राणायाम।
- मन का एकाग्रण।
- समाधि प्राप्ति।
✨ सभी योगों का समन्वय
भगवद्गीता में ये चार योग एक-दूसरे के पूरक हैं। सभी का आधार भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश है, जो कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिए गए [web:1][web:34]. अपनी प्रवृत्ति के अनुसार योग चुनें और मोक्ष प्राप्त करें।


