Madhav Das Baba: भक्त शिरोमणि श्री माधव दास जी की जीवनी

भगवान जगन्नाथ के अनन्य भक्त श्री माधव दास जी (Madhav Das Baba) का जीवन भक्ति, समर्पण और भगवान के प्रति अगाध प्रेम की एक जीती-जागती मिसाल है। उनकी भक्ति ऐसी थी कि स्वयं सृष्टि के स्वामी भगवान जगन्नाथ को उनकी सेवा करने के लिए धरती पर आना पड़ा।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

श्री माधव दास जी का जन्म 18वीं शताब्दी के अंत में (अनुमानित 1798 ई.) बंगाल के नदिया जिले के शांतिपुर के पास फुलिया ग्राम में हुआ था। वे एक कुलीन ब्राह्मण परिवार से थे और रामायण के रचयिता कृत्तिवास ओझा के वंशज माने जाते थे। बचपन से ही उनका मन संसार के बजाए अध्यात्म की ओर अधिक झुकता था।

विवाह, संतान और वैराग्य

माधव दास जी का विवाह हुआ और उनके बच्चे भी हुए। उन्होंने कुछ समय तक न्यायिक विभाग में लिपिक (Clerk) के रूप में कार्य भी किया। उनकी पत्नी की मृत्यु के बाद उन्हें संसार से गहरा वैराग्य हो गया, जिसके बाद उन्होंने घर का त्याग कर दिया और संन्यास धारण कर लिया।

जगन्नाथ पुरी आगमन और भक्ति

घर छोड़ने के बाद माधव दास जी जगन्नाथ पुरी पहुँचे। वहां उन्होंने समुद्र के किनारे एक एकांत स्थान चुना और भगवान जगन्नाथ के ध्यान में मग्न हो गए। वे इतने गहरे ध्यान में रहते थे कि उन्हें अपने खाने-पीने तक की सुध नहीं रहती थी।

भगवान जगन्नाथ और माधव दास: सखा भाव

माधव दास जी भगवान जगन्नाथ को अपना आराध्य ही नहीं, बल्कि अपना सखा (मित्र) मानते थे। एक प्रसिद्ध घटना के अनुसार, जब उन्हें भीषण अतिसार (Diarrhea) हुआ, तब स्वयं भगवान जगन्नाथ एक बालक का रूप धरकर आए और कई दिनों तक उनकी सेवा की। जब माधव दास जी ने पहचान लिया कि यह स्वयं भगवान हैं, तब भगवान ने कहा, “प्रारब्ध का भोग तो भोगना ही पड़ता है, पर मैं अपने भक्त को कष्ट में अकेले नहीं छोड़ सकता था”।

अनवसर (Anabasara) परंपरा का रहस्य

माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ ने माधव दास जी के रोग के अंतिम 15 दिन अपने ऊपर ले लिए थे। यही कारण है कि आज भी जगन्नाथ पुरी में रथ यात्रा से पहले भगवान 15 दिनों के लिए बीमार पड़ते हैं (जिसे अनवसर कहा जाता है), और इस दौरान मंदिर के कपाट बंद रहते हैं।

देहावसान

लगभग 123 वर्ष की दीर्घायु प्राप्त करने के बाद, सन् 1921 में गुजरात के मालसर (नर्मदा तट) के पास उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्यागा और प्रभु के चरणों में विलीन हो गए।